जानिये इस सरल प्रक्रिया के बारे में जिससे आप घर पर मछली पकड़ने का उपकरण बना सकते हैं
- Sunita Sandilya
- Mar 28, 2021
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मछली हमेशा से आदिवासी खानपान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। इसे बड़े चाव से खाया जाता है। इसलिए लोग मछली पकड़ने की नई-नई तरकीब बनाते रहते हैं। जंगल में निवास करने वाले लोग लकड़ी या बाँस और तांत की रस्सी तथा स्टील के तार के सहारे मछली पकड़ते हैं।
आइए जानते हैं एक आदिवासी भाई की कला के बारे में :
कोरबा जिले के घाघरा गाँव में रहने वाले रामसाय कमरो मछली पकड़ने की कला में माहिर हैं। सबसे पहले वे एक गरि डांग बनाते हैं। इसे बनाने के लिए वे जंगल या आसपास से बाँस की एक थोड़ी लंबी और पतली सी लाठी काट लेते हैं। इसके बाद उसकी पत्तियों को अच्छी तरह से छील लेते हैं। फिर उस बाँस की पतली लाठी को 2 से 3 दिनों तक सुखाते हैं। सुखाने के बाद बाँस की लाठी के नोक पर तांत की धागे के समान पतली रस्सी को बांध देते हैं। फिर वे रस्सी में मोर के पंख का मध्य भाग को लगा देते हैं। जिसे मंजूर (मोर) पिंच फोही कहते हैं। यह मंजूर पिंच का फोही उसी तांत की रस्सी में लगी हुई रहती है। चूँकि यह बहुत ही हल्का होता है, इस कारण यह पानी में नहीं डूबता और पानी के ऊपर ही रहता है। इस तांत की रस्सी के दूसरे छोड़ पर तार की एक नोक बनाकर लगा देते हैं। इस नोक में मछली के चारे के लिए जमीन से केंचुआ निकालकर लगा देते हैं।
आम तौर पर केंचुआ गीले जमीन में पाये जाते हैं। इसके अलावा धान के भूसे की रोटी बनाकर, उसे पत्ते में पका कर इस नोक में चारे के रूप में लगा देते हैं। गरि डांग को बंसी डांग भी कहते हैं। इसको तैयार करके तालाब या ऐसी जगह जहाँ जमे हुए पानी में मछली मौजूद हो वहाँ जाकर किनारे से गरि डांग की रस्सी को अन्दर पानी की ओर फेंकते हैं। उसके बाद किनारे में बिल्कुल शांत होकर कर बैठ जाते हैं। मछलियाँ रस्सी से बंधे तार की नोक में फंसे चारे को खाने आती है। मछली जब उसे पकड़ती है तो तांत की रस्सी में लगी फोही डूब जाती है। इससे पता चल जाता है कि हमारे गरि में मछली फस गई है। अगर फोही दायी तरफ से डूबता है तो गरि डांग को बायी ओर से खीचतें हैं, और अगर बायी ओर से डूबता है तो गरि डांग को दायी तरफ से खींच कर मछली को बाहर निकालते हैं।
इस तरह से आदिवासी लोगों ने जीवन से जुड़े विभिन्न क्षेत्रों में बेहद ख़ास तरीकों और तकनीकों की खोज की हैं जो आज के समय में लुप्त होती जा रही है।
यह आलेख आदिवासी आवाज़ प्रोजेक्ट के अंतर्गत मिजेरियोर और प्रयोग समाज सेवी संस्था के सहयोग से तैयार किया गया है।
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