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मुठ त्योहार: आदिवासी क्षेत्रों की पुरानी परंपरा और रीति-रिवाजों का जश्न।

Writer: Shubham PendroShubham Pendro

मनोज कुजूर द्वारा सम्पादित


आदिवासी क्षेत्रों में फसल लगाने से पहले ऐसे बहुत से त्योहार मनाए जाते हैं, जो आदिवासियों के लिए बहुत ही जरूरी होता है, चाहे वह प्रकृति से जुड़ा हो या आदिवासियों के जीवन से हो। हम अब एक त्योहार के बारे में विस्तार से जानेंगे, जिसे आदिवासी क्षेत्रों में मुठ त्योहार के नाम से जाना जाता है। फिलहाल, फसल लगाने का समय आया है, और गांव क्षेत्र में इस अवसर पर लोग फसल लगाने से पहले या फसल काटने से पहले इस महत्वपूर्ण त्योहार को मनाते हैं। इसी तरह कोडगार क्षेत्र में फसल लगाने से पहले मुठ त्योहार को पुरानी परंपरा और रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है। इस मुठ त्योहार को अन्य क्षेत्रों में फसल लगाने के बाद मनाया जाता है, लेकिन हमारे कोड़गार ग्राम में फसल लगाने से पहले यह त्योहार आयोजित किया जाता है।

महिला के द्वारा गुड़ रोटी व महुआ फूल का सेवन किया जा रहा है

हमने पूरी ब्लॉक के अंतर्गत आने वाले कोडगार गांव में बसने वाले बनवारी लाल से बात की, जिनकी उम्र 40 है और वे एक आदिवासी गोंड समुदाय से हैं। उन्होंने हमें बताया कि हर साल फसल लगाने से पहले वे और उनके लोग प्रकृति पूजा करने के साथ मुठ त्योहार मनाते हैं, जिसे बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। वे और भी जानकारी देते हैं और बतलाते हैं यह मुठ त्योहार पुरानी परंपरा और रीति-रिवाजों के साथ पहले से मनाया जाता रहा है और आज भी उनके घरों में मनाया जाता है। इस त्योहार में विभिन्न प्रकार के पकवान तैयार किए जाते हैं, और इस त्योहार की खास बात यह है कि बने हुए पकवान और रोटी को सिर्फ घर की महिलाएं खा सकती हैं, जो बहू के रूप में आई रहती हैं, और उनके बाहर के महिलाओं को नहीं दिया जाता है।

बनवारी लाल

बात करते हैं इस त्यौहार की विशेष पकवान की


हर त्योहार में पकवान का अपना महत्व होता है, और सभी त्योहारों में विभिन्न प्रकार की मिठाइयाँ बनाई जाती हैं। लेकिन हम जिस मुठ त्योहार के बारे में बात कर रहे हैं, वहां पर सिर्फ चावल की रोटी, गुड़, और महुआ फूल का उपयोग होता है, और इस रोटी को सिर्फ घर की बहू खाती हैं। दाल और चावल से एक विशेष पकवान "कागोरी" बनाईं जाती है जिसे दूसरे क्षेत्रों में खिचड़ी कहा जाता है, लेकिन इसमें ना ही शक्कर होती है और ना ही नमक। इस त्योहार में रोटी या कागोरी को सिर्फ घर की महिलाएं खा सकती हैं। यह खाना बाहर के लोगों को नहीं परोसा होता है।

रोटी, खिचड़ी और सुखा हुआ महुआ का फूल

आपको बताते हैं कि मुठ त्यौहार में किन-किन देवी देवताओं की पूजा-अर्चना की जाती है


सराई के पत्ते से बनाए गए पतरी में पांच रोटियाँ, पिसान के द्वारा बनाई गई 'चौक' पर रखी जाती है। जिसे अन्य क्षेत्रों में रंगोली के नाम से भी जाना जाता है। फिर चावल को पीस कर चौकोना रंगोली बनाने के बाद, घर के सभी देवताओं जैसे पुजारी, बूढ़ादेव, अंधियारी, रंग बगिया आदि की पूजा और आराधना करते हैं। इस पूजा का प्रमुख उद्देश्य घर के सुख-शांति को स्थापित करना एवं परिवार की तकलीफों को दूर करना होता है।

चावल और दाल की बनी खिचड़ी

मुठ त्योहार के बाद सभी लोग अपने क्षेत्र में फसल लगाने का काम शुरू करते हैं। सबसे पहले भुट्टा लगाते हैं और फिर अन्य फसलें लगाते हैं। जिसमें अरहर को भी शामिल किया जाता है। इस तरह, यह मुठ त्योहार समापन की ओर बढ़ जाता है।

घर के देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना करते हुए एक पुरुष

अन्य क्षेत्रों में मुठ त्योहार :-


यह मुठ त्योहार दूसरे ग्रामीण क्षेत्रों में मुठिया त्योहार के नाम से प्रसिद्ध है, जो फसलों में बालियां लगाने के बाद शुरू होता है और फसल काटने से पहले तक मुठिया त्योहार मनाया जाता है। इस मुठिया त्योहार के दौरान धान के बीज के 2-3 दाने को निकालकर घर में बने रहे चावल में डाल दिया जाता है, जिसे "नया चावल" कहा जाता है। जिसे घर के सभी सदस्य खाते हैं। इसे नवा त्योहार के रूप में भी जानते हैं। यह त्योहार सभी आदिवासियों के लिए महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि इस तरह वे सभी प्राकृति द्वारा प्रदत्त अनमोल उपहारों को स्वीकार करते हैं और उन्हें अपने देवताओं को भी अर्पित करते हैं। यहां हम यह कह सकते हैं कि आदिवासी ही ऐसे लोग हैं, जो फसलों में फल आने और फसल लगाने की खुशी में पूरे रीति रिवाज के साथ सभी त्योहार को बड़े धूमधाम से मनाते हैं।


यह त्यौहार ग्रामीण क्षेत्रों में सबसे ज्यादा देखने को मिलता है, क्योंकि गांव के लोगों में त्योहारों के प्रति हर्षोल्लास एवं उमंग अलग ही होता है। यह परम्परा कई पीढ़ियों से से चली आ रही है, जिसे आज भी लोग अपने दैनिक जीवन में मनाते आ रहे हैं। हम कह सकते हैं कि हमारे पूर्वजों की परंपरा है, जिसे आज भी लोग कहीं न कहीं त्योहारों वा संस्कृति में अपनी रीति रिवाजों के माध्यम से बरकरार रखे हुए हैं।


नोट: यह लेख Adivasi Awaaz प्रोजेक्ट के अंतर्गत लिखा गया है, जिसमें ‘प्रयोग समाजसेवी संस्था’ और ‘Misereor’ का सहयोग है।

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